वर्षों बाद "द कश्मीर फाइल्स" सिनेमा हॉल में देखी थी
विनय सिंह बैस, नई दिल्ली। चूंकि मैं ‘सेक्युलरिज्म’ की चाशनी लगाकर अब तक परोसे जा रहे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के काले सच से पूरी तरह वाकिफ हूँ, इसलिए मुझे फ़िल्म में दिखाए गए दृश्य देखकर कोई विशेष आश्चर्य नहीं हुआ। हाँ व्यथित जरूर हुआ, पीड़ा जरूर हुई। क्रोध भी खूब आया। फ़िल्म देखकर मुझे तत्कालीन राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था पर तरस भी आता रहा। कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार होते देखकर और अपने ही देश मे तथाकथित बहुसंख्यकों को 35 वर्षों से विस्थापित की जिंदगी जीता देखकर दुःख होता है और इस नरसंहार के विरुद्ध

विनय सिंह बैस, नई दिल्ली। चूंकि मैं ‘सेक्युलरिज्म’ की चाशनी लगाकर अब तक परोसे जा रहे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के काले सच से पूरी तरह वाकिफ हूँ, इसलिए मुझे फ़िल्म में दिखाए गए दृश्य देखकर कोई विशेष आश्चर्य नहीं हुआ। हाँ व्यथित जरूर हुआ, पीड़ा जरूर हुई। क्रोध भी खूब आया। फ़िल्म देखकर मुझे तत्कालीन राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था पर तरस भी आता रहा। कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार होते देखकर और अपने ही देश मे तथाकथित बहुसंख्यकों को 35 वर्षों से विस्थापित की जिंदगी जीता देखकर दुःख होता है और इस नरसंहार के विरुद्ध
Source: Kolkata Hindi News
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