वन महोत्सव : हरियाली का महापर्व, प्रकृति संरक्षण का राष्ट्रीय संकल्प और देश के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला
भारत की संस्कृति में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वृक्षों को केवल जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि देवतुल्य स्थान भी दिया है। पीपल, बरगद, नीम, तुलसी और आंवले जैसे वृक्षों की पूजा की परंपरा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज सदियों से पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता आया है। आधुनिक समय में बढ़ते औद्योगीकरण, शहरीकरण और अनियंत्रित विकास ने वनों के अस्तित्व को गंभीर चुनौती दी है। यही कारण है कि देश में प्रत्येक वर्ष 1 जुलाई से 7 जुलाई तक वन महोत्सव मनाया जाता है। यह केवल एक सरका
भारत की संस्कृति में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वृक्षों को केवल जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि देवतुल्य स्थान भी दिया है। पीपल, बरगद, नीम, तुलसी और आंवले जैसे वृक्षों की पूजा की परंपरा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज सदियों से पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता आया है। आधुनिक समय में बढ़ते औद्योगीकरण, शहरीकरण और अनियंत्रित विकास ने वनों के अस्तित्व को गंभीर चुनौती दी है। यही कारण है कि देश में प्रत्येक वर्ष 1 जुलाई से 7 जुलाई तक वन महोत्सव मनाया जाता है। यह केवल एक सरका
Source: Swatantra Prabhat
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