कजरी में झरती है श्रद्धा, विरह और लोकआस्था की रिमझिम: सुरेश गांधी
जब आकाश पर सावन की पहली बदरी उतरती है, तब केवल मौसम नहीं बदलता, भारतीय मानस की धड़कन भी बदल जाती है। मिट्टी की सोंधी गंध, आम की डालियों पर पड़े झूले, आंगन में लौटती बेटियां और चौपालों से उठती कजरी-ये सब मिलकर उस सांस्कृतिक संसार का निर्माण करते हैं, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी लोक परंपराओं में हैं। आज महानगरों की चकाचौंध और डिजिटल संगीत के शोर के बीच भी कजरी का स्वर इसलिए जीवित है, क्योंकि वह मनुष्य और प्रकृति के बीच के आत्मीय संवाद को बचाए रखता है। कजरी में वर्षा का संगीत है, खेतों की हरिय

जब आकाश पर सावन की पहली बदरी उतरती है, तब केवल मौसम नहीं बदलता, भारतीय मानस की धड़कन भी बदल जाती है। मिट्टी की सोंधी गंध, आम की डालियों पर पड़े झूले, आंगन में लौटती बेटियां और चौपालों से उठती कजरी-ये सब मिलकर उस सांस्कृतिक संसार का निर्माण करते हैं, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी लोक परंपराओं में हैं। आज महानगरों की चकाचौंध और डिजिटल संगीत के शोर के बीच भी कजरी का स्वर इसलिए जीवित है, क्योंकि वह मनुष्य और प्रकृति के बीच के आत्मीय संवाद को बचाए रखता है। कजरी में वर्षा का संगीत है, खेतों की हरिय
Source: Tarun Mitra
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