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आज का श्लोक : संगठित समाज के बिना राष्ट्र वैभवशाली नहीं हो सकता
यह श्लोक संगठन, सामाजिक एकता और जन-शक्ति के महत्व को दर्शाने वाला एक अत्यंत दूरदर्शी विचार है। धन-धान्य-सुसम्पन्नं स्वर्णरत्नादि संभवम्। सुसंहतिं विना राष्ट्र नहि स्यात् शून्य-वैभवम्।। भावार्थ- धन-धान्य से सुसम्पन्न, सोने और रत्नों की प्रचुर खानों से परिपूर्ण हो, ऐसा राष्ट्र भी संगठित समाज के बिना वैभवशाली नहीं हो सकता। आज की प्रासंगिकता: आज [...]
panchjanya26 Jul 2026, 00:30👁 0 views

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यह श्लोक संगठन, सामाजिक एकता और जन-शक्ति के महत्व को दर्शाने वाला एक अत्यंत दूरदर्शी विचार है। धन-धान्य-सुसम्पन्नं स्वर्णरत्नादि संभवम्। सुसंहतिं विना राष्ट्र नहि स्यात् शून्य-वैभवम्।। भावार्थ- धन-धान्य से सुसम्पन्न, सोने और रत्नों की प्रचुर खानों से परिपूर्ण हो, ऐसा राष्ट्र भी संगठित समाज के बिना वैभवशाली नहीं हो सकता। आज की प्रासंगिकता: आज [...]
Source: Panchjanya
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