सुख और प्रसन्नता का केंद्र बाहर नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर अंतःकरण में है
संसार का प्रत्येक व्यक्ति सुखी और प्रसन्न रहना चाहता है, परन्तु उसके साथ समस्या यह है कि वह सुख और प्रसन्नता सांसारिक भौतिक पदार्थों में खोजता है। वह समझता है कि अमुक-अमुक पदार्थ मुझे मिल जाय तो मैं सुखी हो जाऊँ। परन्तु यह उसका भ्रम है, क्योंकि बाह्य और दृश्यमान वस्तु अर्थात जिसे हम अपनी आंखों से देख सकते हैं, व्यक्ति को स्थायी सुख, शान्ति और प्रसन्नता प्रदान नहीं कर सकती, क्योंकि सुख और शान्ति का केन्द्र बाहर नहीं वह व्यक्ति के भीतर अन्तःकरण में है। भौतिक संसार हमारी तृष्णाओं को बढ़ाता है। मानव

संसार का प्रत्येक व्यक्ति सुखी और प्रसन्न रहना चाहता है, परन्तु उसके साथ समस्या यह है कि वह सुख और प्रसन्नता सांसारिक भौतिक पदार्थों में खोजता है। वह समझता है कि अमुक-अमुक पदार्थ मुझे मिल जाय तो मैं सुखी हो जाऊँ। परन्तु यह उसका भ्रम है, क्योंकि बाह्य और दृश्यमान वस्तु अर्थात जिसे हम अपनी आंखों से देख सकते हैं, व्यक्ति को स्थायी सुख, शान्ति और प्रसन्नता प्रदान नहीं कर सकती, क्योंकि सुख और शान्ति का केन्द्र बाहर नहीं वह व्यक्ति के भीतर अन्तःकरण में है। भौतिक संसार हमारी तृष्णाओं को बढ़ाता है। मानव
Source: रॉयल बुलेटिन
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