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*सिनेमा आदर्शों में बदलाव:कैसे हिन्दी सिनेमा ने अपना नैतिक क़ुतबनुमा खोया*
बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन, जिसमें एक अमीर और युवा दम्पत्ति दो रिक्शावालों के साथ यूँ दौड़ लगाते हैं कि मानो वे बैट्री पर चलने वाले खिलौने हों जब तक कि उनमें से एक थककर गिर नहीं पड़ता है, इस फ़िल्म के तक़रीबन 73 साल बाद हमने हाल ही में टिर्री प्रैंक देखा। इसमें [...]
ramswaroop mantri12 Aug 2026, 15:16👁 0 views
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बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन, जिसमें एक अमीर और युवा दम्पत्ति दो रिक्शावालों के साथ यूँ दौड़ लगाते हैं कि मानो वे बैट्री पर चलने वाले खिलौने हों जब तक कि उनमें से एक थककर गिर नहीं पड़ता है, इस फ़िल्म के तक़रीबन 73 साल बाद हमने हाल ही में टिर्री प्रैंक देखा। इसमें [...]
Source: Agnialok
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