न्यायालयों में कृत्रिम बुद्धिमता सहायक, लेकिन निर्णायक नहीं
भारतीय न्यायपालिका कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग अदालती प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी और सुगम बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन न्यायिक निर्णय का अंतिम अधिकार मानव के पास ही रहेगा। एआई प्रशासनिक और शोध संबंधी कार्यों में सहायक हो सकती है, पर वह सत्य की पुष्टि नहीं करती और मनगढ़ंत जानकारी (हैलुसिनेशन) का जोखिम भी रहता है। इस चुनौती से निपटने के लिए रिट्रीवल-ऑगमेंटेड जेनरेशन (क्र्रत्र) जैसी तकनीक प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर उत्तर तैयार करने में मदद करती है। भारत के पास अपना लीगल एलएलएम

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Source: Patrika News
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