गरिमा बनाम मनोरंजन
गरिमा बनाम मनोरंजन – मनीषा मंजरी हँसी मनुष्य की सबसे सहज और सुंदर अभिव्यक्तियों में से एक मानी जाती है। एक शिशु की खिलखिलाहट से लेकर जीवन के सबसे कठिन क्षणों में भी चेहरे पर आ जाने वाली हल्की मुस्कान तक, हँसी हमें मनुष्य बनाती है। यह तनाव कम करती है, संबंधों को सहज बनाती है और जीवन की कठोरताओं के बीच राहत का एक क्षण प्रदान करती है। किंतु क्या हर हँसी समान रूप से निर्मल होती है? क्या हर ठहाका उत्सव का प्रतीक होता है? हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हँसी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही; वह एक सामाज

गरिमा बनाम मनोरंजन – मनीषा मंजरी हँसी मनुष्य की सबसे सहज और सुंदर अभिव्यक्तियों में से एक मानी जाती है। एक शिशु की खिलखिलाहट से लेकर जीवन के सबसे कठिन क्षणों में भी चेहरे पर आ जाने वाली हल्की मुस्कान तक, हँसी हमें मनुष्य बनाती है। यह तनाव कम करती है, संबंधों को सहज बनाती है और जीवन की कठोरताओं के बीच राहत का एक क्षण प्रदान करती है। किंतु क्या हर हँसी समान रूप से निर्मल होती है? क्या हर ठहाका उत्सव का प्रतीक होता है? हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हँसी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही; वह एक सामाज
Source: Newsprahari
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