क्यों श्मशान की सीमा तक ही टिकता है मन का वैराग्य
चौंकाने वाली बात श्मशान के ठीक बाहर की है, जैसे ही किसी प्रियजन का अंतिम संस्कार पूरा होता है, लोग घाट से निकलकर जब घर आकर स्नान आदि करते हैं, कुछ ही देर बाद उनके भीतर का वैराग्य दम तोड़ देता है। जहां कुछ देर पहले चिता के सामने लोग, ‘सब कुछ मोह माया है, सब यहीं छोडकर जाना है आदि कहते हैं,’ वहीं घर आते ही फिर से धन आदि कमाने की दौड़ में पाप-पुण्य को भूल जाते हैं।
चौंकाने वाली बात श्मशान के ठीक बाहर की है, जैसे ही किसी प्रियजन का अंतिम संस्कार पूरा होता है, लोग घाट से निकलकर जब घर आकर स्नान आदि करते हैं, कुछ ही देर बाद उनके भीतर का वैराग्य दम तोड़ देता है। जहां कुछ देर पहले चिता के सामने लोग, ‘सब कुछ मोह माया है, सब यहीं छोडकर जाना है आदि कहते हैं,’ वहीं घर आते ही फिर से धन आदि कमाने की दौड़ में पाप-पुण्य को भूल जाते हैं।
Source: Nbt Navbharattimes
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