क्या डिजिटल टूलकिट छात्र आंदोलनों को सरकार-विरोधी अभियान में बदल रहे हैं?
साज़िश की कहानियों को अक्सर लोगों का वहम या कल्पना कहकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि हर साज़िश झूठ नहीं होती। कई बार जो बातें शुरुआत में अफवाह लगती हैं , बाद में सच साबित हो जाती हैं। इसलिए किसी भी बात को आँख बंद करके मान लेना या पूरी तरह नकार देना , दोनों ही गलत हो सकते हैं। इसी संदर्भ में एक सवाल उठता है। क्या यह संभव है कि कुछ छात्र आंदोलन पूरी तरह वैसे न हों जैसे वे ऊपर से दिखाई देते हैं ? यह सवाल छात्रों की नीयत ...
साज़िश की कहानियों को अक्सर लोगों का वहम या कल्पना कहकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि हर साज़िश झूठ नहीं होती। कई बार जो बातें शुरुआत में अफवाह लगती हैं , बाद में सच साबित हो जाती हैं। इसलिए किसी भी बात को आँख बंद करके मान लेना या पूरी तरह नकार देना , दोनों ही गलत हो सकते हैं। इसी संदर्भ में एक सवाल उठता है। क्या यह संभव है कि कुछ छात्र आंदोलन पूरी तरह वैसे न हों जैसे वे ऊपर से दिखाई देते हैं ? यह सवाल छात्रों की नीयत ...
Source: दैनिक जागरण
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