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आखिर क्यों दिल्ली में गाना पसंद करते थे मोहम्मद रफी? 1964 की उस शाम में छिपा है जवाब, जब तालियों से गूंज उठा था मैदान
तालियों की गड़गड़ाहट, रफी साहब की आवाज और सुरिंदर कौर का साथ, 1964 की वह शाम सिर्फ एक कॉन्सर्ट नहीं बल्कि इतिहास का हिस्सा बन गई थी. आज भी उस महफिल का जिक्र बुजुर्ग शौक से करते हैं.
विवेक शुक्ला31 Jul 2026, 14:38👁 0 views

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तालियों की गड़गड़ाहट, रफी साहब की आवाज और सुरिंदर कौर का साथ, 1964 की वह शाम सिर्फ एक कॉन्सर्ट नहीं बल्कि इतिहास का हिस्सा बन गई थी. आज भी उस महफिल का जिक्र बुजुर्ग शौक से करते हैं.
Source: Ndtv
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